पहला प्यार पहली दफ़ा जब आँख मिली तो दिल में उठे तूफ़ान कई दिल ने दिल का हाल सुनाया जागे फिर अरमान कई उन का बदन नाज़ुक नाज़ुक था देख के हम शर्माए बहुत दोनों अंजाने थे लेकिन इक दूजे को भाए बहुत ख़ुद को बड़ी मुश्किल से सँभाला ऐसा लगा अब जान गई रुख़ से पल्लू जब सरकाया फिर तो हुए बेजान कई हँसते हुए लट बिखरा के वो सामने आ कर बैठ गए शर्म से हम ने उठना चाहा वो तो हम पर ऐंठ गए हाथ पकड़ के पास बिठाया प्यार की बातें करने लगे गाल भी चू में हाथ भी चू में और किए एहसान कई अगले दिन जब याद आई तो दिल जोरों से रोने लगा प्यार था पहला दिल था ज़िद्दी पीछे पीछे आ ही गया हम ने दिल को रोकना चाहा और इसे समझाया भी लेकिन इसने एक न मानी और किए नुक़सान कई
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया
ZafarAli Memon
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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
Prashant Kumar
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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी
Prashant Kumar
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"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ
Prashant Kumar
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"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे" क्यूँँ है इतनी जवाँ क्यूँँ है इतनी हसीं नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं चाँद तकता है रातों को छत से तुझे राह में देखता है पलट के तुझे मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे राह में देखता है पलट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है लग रहा अपनी आदत से मजबूर है तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा आड़ में देखता है सिमट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में जान ऐसे में घर से निकलना नहीं कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में कुछ न कुछ बात तो तुझ में है जान-ए-मन यूँँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे तू अकेले दुकेले न जाना कहीं तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा नींद में देखता हूँ उचट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी सब सेे ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे
Prashant Kumar
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"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है
Prashant Kumar
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