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"हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं" बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं सारे ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं यहाँ पर शह भी पड़ती है यहाँ पर मात होती है कभी इक चाल टलती है कभी बाज़ी पलटती है यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं मगर मैं वो पियादा हूँ जो हर घर में कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले हमेशा क़त्ल हो जाता है

Jaun Elia10 Likes

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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"क़ातिल" सुना है तुम ने अपने आख़िरी लम्हों में समझा था कि तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो मेरे बाज़ुओं में हो सुना है बुझते बुझते भी तुम्हारे सर्द ओ मुर्दा लब से एक शो'ला शोला-ए-याक़ूत-फ़ाम ओ रंग ओ उम्मीद-ए-फ़रोग़-ए-ज़िंदगी-आहंग लपका था हमें ख़ुद में छुपा लीजे ये मेरा वो अज़ाब-ए-जाँ है जो मुझ को मिरे अपने ख़ुद अपने ही जहन्नम में जलाता है तुम्हारा सीना-ए-सीमीं तुम्हारे बाज़ूवान-ए-मर-मरीं मेरे लिए मुझ इक हवसनाक-ए-फ़रोमाया की ख़ातिर साज़ ओ सामान-ए-नशात ओ नश्शा-ए-इशरत-फ़ुज़ूनी थे मिरे अय्याश लम्हों की फ़ुसूँ-गर पुर-जुनूनी के लिए सद-लज़्ज़त आगीं सद-करिश्मा पुर-ज़बानी थे तुम्हें मेरी हवस-पेशा मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बे-वफ़ाई का गुमाँ तक इस गुमाँ का एक वहम-ए-ख़ुद गुरेज़ाँ तक नहीं था क्यूँँ नहीं था क्यूँँ नहीं था क्यूँँ कोई होता कोई तो होता जो मुझ से मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बे-वफ़ाई की सज़ा में ख़ून थुकवाता मुझे हर लम्हे की सूली पे लटकाता मगर फ़रियाद कोई भी नहीं कोई दरेग़ उफ़्ताद कोई भी मुझे मफ़रूर होना चाहिए था और मैं सफ़्फ़ाक-क़ातिल बे-वफ़ा ख़ूँ-रेज़-तर मैं शहर में ख़ुद-वारदाती शहर में ख़ुद-मस्त आज़ादाना फिरता हूँ निगार-ए-ख़ाक-आसूदा बहार-ए-ख़ाक-आसूदा

Jaun Elia

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"बस एक अंदाज़ा" बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुए उठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओ मैं आया हूँ मैं अंदाज़े से समझा हूँ यहाँ सोई हुई हो तुम यहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद में बाद-हा-ए-तुंद ने मेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!

Jaun Elia

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"रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं" चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा उन की लज़्ज़त और अज़िय्यत से मैं अपना कोई अहद नहीं तोडूँगा तेज़ नज़र ना-बीनाओं की आबादी में क्या मैं अपने ध्यान की ये पूँजी भी गिनवा दूँ हाँ मेरे ख़्वाबों को तुम्हारी सुब्हों की सर्द और साया-गूँ ताबीरों से नफ़रत है इन सुब्हों ने शाम के हाथों अब तक जितने सूरज बेचे वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैं जिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है मेरे अंधेरे भी सच्चे हैं और तुम्हारे ''रोग उजाले'' भी झूटे हैं रातें सच्ची हैं दिन झूटे जब तक दिन झूटे हैं जब तक रातें सहना और अपने ख़्वाबों में रहना ख़्वाबों को बहकाने वाले दिन के उजालों से अच्छा है हाँ मैं बहकावों की धुँद नहीं ओढूँगा चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो मैं फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा अपना अहद नहीं तोडूँगा यही तो बस मेरा सब कुछ है माह ओ साल के ग़ारत-गर से मेरी ठनी है मेरी जान पर आन बनी है चाहे कुछ हो मेरे आख़िरी साँस तलक अब चाहे कुछ हो

Jaun Elia

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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"शायद" मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँ शायद, जान-ए-जाँ शायद कि अब तुम मुझ को पहले से ज़्यादा याद आती हो है दिल ग़मगीं, बहुत ग़मगीं कि अब तुम याद दिलदाराना आती हो शमी में दूर मान्दा हो बहुत रंजीदा हो मुझ सेे मगर फिर भी मशा में जाँ में मेरे आशती मंदाना आती हो जुदाई में बला का इल्तिफ़ाते मुहरिमाना है क़यामत की ख़बरगिरी है बेहद नाज़ बरदारी का आलम है तुम्हारा रंग मुझ में और गहरे होते जाते हैं मैं डरता हूँ मेरे एहसास के इस ख़्वाब का अंजाम क्या होगा ये मेरे अंदरूने ज़ात के ताराज गर जज़्बों के बेरी वक़्त की साज़िश न हो कोई तुम्हारे इस तरह हर लम्हा याद आने से दिल सहमा हुआ सा है तो फिर तुम कम ही याद आओ मता-ए-दिल, मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ बहुत कुछ बह गया है सीले माह व साल में अब तक सभी कुछ तो न बह जाए कि मेरे पास रह भी क्या गया है कुछ तो रह जाए

Jaun Elia

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