"शायद" मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँ शायद, जान-ए-जाँ शायद कि अब तुम मुझ को पहले से ज़्यादा याद आती हो है दिल ग़मगीं, बहुत ग़मगीं कि अब तुम याद दिलदाराना आती हो शमी में दूर मान्दा हो बहुत रंजीदा हो मुझ सेे मगर फिर भी मशा में जाँ में मेरे आशती मंदाना आती हो जुदाई में बला का इल्तिफ़ाते मुहरिमाना है क़यामत की ख़बरगिरी है बेहद नाज़ बरदारी का आलम है तुम्हारा रंग मुझ में और गहरे होते जाते हैं मैं डरता हूँ मेरे एहसास के इस ख़्वाब का अंजाम क्या होगा ये मेरे अंदरूने ज़ात के ताराज गर जज़्बों के बेरी वक़्त की साज़िश न हो कोई तुम्हारे इस तरह हर लम्हा याद आने से दिल सहमा हुआ सा है तो फिर तुम कम ही याद आओ मता-ए-दिल, मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ बहुत कुछ बह गया है सीले माह व साल में अब तक सभी कुछ तो न बह जाए कि मेरे पास रह भी क्या गया है कुछ तो रह जाए
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"बस एक अंदाज़ा" बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुए उठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओ मैं आया हूँ मैं अंदाज़े से समझा हूँ यहाँ सोई हुई हो तुम यहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद में बाद-हा-ए-तुंद ने मेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!
Jaun Elia
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"रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं" चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा उन की लज़्ज़त और अज़िय्यत से मैं अपना कोई अहद नहीं तोडूँगा तेज़ नज़र ना-बीनाओं की आबादी में क्या मैं अपने ध्यान की ये पूँजी भी गिनवा दूँ हाँ मेरे ख़्वाबों को तुम्हारी सुब्हों की सर्द और साया-गूँ ताबीरों से नफ़रत है इन सुब्हों ने शाम के हाथों अब तक जितने सूरज बेचे वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैं जिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है मेरे अंधेरे भी सच्चे हैं और तुम्हारे ''रोग उजाले'' भी झूटे हैं रातें सच्ची हैं दिन झूटे जब तक दिन झूटे हैं जब तक रातें सहना और अपने ख़्वाबों में रहना ख़्वाबों को बहकाने वाले दिन के उजालों से अच्छा है हाँ मैं बहकावों की धुँद नहीं ओढूँगा चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो मैं फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा अपना अहद नहीं तोडूँगा यही तो बस मेरा सब कुछ है माह ओ साल के ग़ारत-गर से मेरी ठनी है मेरी जान पर आन बनी है चाहे कुछ हो मेरे आख़िरी साँस तलक अब चाहे कुछ हो
Jaun Elia
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"हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं" बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं सारे ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं यहाँ पर शह भी पड़ती है यहाँ पर मात होती है कभी इक चाल टलती है कभी बाज़ी पलटती है यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं मगर मैं वो पियादा हूँ जो हर घर में कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले हमेशा क़त्ल हो जाता है
Jaun Elia
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"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता
Jaun Elia
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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