आ गई सब कुछ गँवा कर तुझ को पाने की घड़ी और फिर सब कुछ गँवाना मेरी फ़ितरत हो गई ज़िंदगानी जीने दे तो जी भी लें हम कुछ घड़ी ये मगर क्या हो गया है फिर मुहब्बत हो गई
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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कुछ न कुछ बोलते रहो हम सेे चुप रहोगे तो लोग सुन लेंगे
Fahmi Badayuni
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
Bashir Badr
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जी भर गया है अब तो जी भर चाहने वालों से भाग रहा हूँ मैं भी मुझ सेे भागने वालों से
nakul kumar
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न बदला है कुछ भी किसी हाल में वही हैं मसाइल नए साल में ज़रा ग़ौर से अब मुझे देखिए वही एक बन्दा ख़द-ओ-ख़ाल में
nakul kumar
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जिस की ख़ातिर शे'र लिखे हैं अश्क भरे पैमानों से उस लड़की का नाम ग़ज़ल है शे'र नहीं कह पाती है कोई तो समझाओ उस को दिल मेरा वीराना है वो लड़की जो ख़्वाब में अक्सर आती है रह जाती है
nakul kumar
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कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो
nakul kumar
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हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है मैं कहता हूँ कि समझो तो कोई बात नहीं ऐसी लेकिन इस दुनिया में शोहरत की हवस मुझे अंदर से खा जाती है
nakul kumar
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