आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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मर चुका है दिल मगर ज़िंदा हूँ मैं ज़हर जैसी कुछ दवाएँ चाहिए पूछते हैं आप आप अच्छे तो हैं जी मैं अच्छा हूँ दुआएँ चाहिए
Jaun Elia
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बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे
Saqib lakhanavi
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बू-ए-गुल फूलों में रहती थी मगर रह न सकी मैं तो काँटों में रहा और परेशाँ न हुआ
Saqib lakhanavi
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ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
Saqib lakhanavi
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जिस शख़्स के जीते जी पूछा न गया 'साक़िब' उस शख़्स के मरने पर उट्ठे हैं क़लम कितने
Saqib lakhanavi
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मुट्ठियों में ख़ाक ले कर दोस्त आए वक़्त-ए-दफ़्न ज़िंदगी भर की मोहब्बत का सिला देने लगे
Saqib lakhanavi
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