बू-ए-गुल फूलों में रहती थी मगर रह न सकी मैं तो काँटों में रहा और परेशाँ न हुआ
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे
Saqib lakhanavi
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ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
Saqib lakhanavi
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मुट्ठियों में ख़ाक ले कर दोस्त आए वक़्त-ए-दफ़्न ज़िंदगी भर की मोहब्बत का सिला देने लगे
Saqib lakhanavi
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आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है
Saqib lakhanavi
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जिस शख़्स के जीते जी पूछा न गया 'साक़िब' उस शख़्स के मरने पर उट्ठे हैं क़लम कितने
Saqib lakhanavi
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