आइना देखता रहा मुझ को उस को पर मैं नज़र नहीं आया
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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यूँँ भी हक़ मुझ पे तेरा बनता है मुझ से जो उम्र में बड़ी है तू
Meem Maroof Ashraf
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यही वो दिन था कि तुझ को गले लगाया था यही वो दिन था कि ख़ुदस बिछड़ गए थे हम
Meem Maroof Ashraf
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तुम्हें इस तरह ही भुलाना है मुमकिन किसी और से दिल लगाना पड़ेगा
Meem Maroof Ashraf
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देख लेता हूँ ख़्वाब में उस को ख़्वाब पर ख़्वाब ही तो होते हैं
Meem Maroof Ashraf
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उस को लगती है हँसी झूटी हँसी खा गई मुझ को मिरी झूटी हँसी
Meem Maroof Ashraf
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