आइना झूठ क्यूँ नहीं कहता टूटना ही अगर मुक़द्दर है
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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ज़ुल्म करते हैं हम पे लोग अभी इतना क्यूँ जलते हम से लोग अभी हम ने तो हक़ किसी का खाया नहीं तंज़ कैसे भी देते लोग अभी
Parvez Shaikh
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यहीं डूब जाने को जी चाहता है यूँँ आँसू बहाने को जी चाहता है नहीं है जहाँ में हमारा कोई अब हमें मुस्कुराने को जी चाहता है
Parvez Shaikh
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ज़ुल्म ऐसा न मेरे साथ करें ज़िस्म में रूह भी न बाक़ी रहे
Parvez Shaikh
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वो ज़ालिम ज़रा कुछ तो खौफ़-ए-ख़ुदा कर कि आ सकती हैं अब क़यामत कभी भी
Parvez Shaikh
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ज़िंदगी चल मिरा क़ुसूर बता हिज्र क्यूँ काटना पड़ा मुझ को
Parvez Shaikh
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