आज-कल सजाकर हम झूटे ख़त नहीं रखते इस हयात में तुम अब अहमियत नहीं रखते
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
Umair Najmi
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बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
Umair Najmi
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ये जो हर सम्त ही वीराना नज़र आता है सच कहूँ गर तो ये ग़लती है तेरी आँखों की
Aqib khan
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साहिर को तो सिर आँखों बिठाया नहीं जाता बर्बादियों का जश्न मनाया नहीं जाता कोशिश में लगे हैं जिसे हम भूलने में दोस्त वो शख़्स घड़ी भर को भुलाया नहीं जाता
Aqib khan
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कब तलक याद करूँँ कितने बहाऊँ आँसू छोड़ भी दे मुझे अब छोड़ के जाने वाले
Aqib khan
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मैं बचकर निकल आया हूँ आइनों से पर अपना ही चेहरा भला कैसे भूलूँ
Aqib khan
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दिल-ए-विरान में कुछ भी नज़र नहीं आता तुम्हारे बा'द यहाँ सब धुआँ धुआँ सा है वो हर सवाल के बदले जवाब चाहता था वो लड़का जो कि तेरी सम्त बे-ज़बाँ सा है
Aqib khan
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