आज रौशन है सहर कल शाम है ज़िन्दगी का मौत ही अंजाम है आदमी ही आदमी को खा रहा जानवर तो ख़्वाह-म-ख़्वाह बदनाम है
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उस की जुल्फ़ें उदास हो जाए इस-क़दर रौशनी भी ठीक नहीं तुम ने नाराज़ होना छोड़ दिया इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं
Fahmi Badayuni
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
Bashir Badr
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मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती
Mirza Ghalib
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हुस्न बला का क़ातिल हो पर आख़िर को बेचारा है इश्क़ तो वो क़ातिल जिस ने अपनों को भी मारा है ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी इस के छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी
Jaun Elia
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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है ज़िन्दगी एक नज़्म लगती है
Gulzar
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है जन्नत में सारी ही नेमत ख़ुदा की मुझे भी बताओ ये जन्नत कहाँ है
"Nadeem khan' Kaavish"
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मिला था जिस बग़ीचे में वो अब शमशान लगता है मुहब्बत ने ये कैसे दिन दिखाए हैं मुहब्बत में
"Nadeem khan' Kaavish"
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तेरे ख़ातिर जहाँ डूबा वो दरिया भी किनारा था
"Nadeem khan' Kaavish"
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ख़ुदा बस यही इक दुआ है हमारी हमारे दिलो को तू मासूम रखना
"Nadeem khan' Kaavish"
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तेरे दिल की इक ये बस्ती, पहले उस इक राजा की थी जिस ने तेरे नाम पर, जंगें भी बे-अंदाज़ा की थी
"Nadeem khan' Kaavish"
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