आज ज़ाहिद को यूँँ मय-कदा याद आया जिस तरह काफ़िरों को ख़ुदा याद आया
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न जाने क्यूँँ गले से लगने की हिम्मत नहीं होती न जाने क्यूँँ पिता के सामने बेटे नहीं खुलते
Kushal Dauneria
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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तेरी आँखों में जो इक क़तरा छुपा है, मैं हूँ जिस ने छुप छुप के तेरा दर्द सहा है, मैं हूँ एक पत्थर कि जिसे आँच न आई, तू है एक आईना कि जो टूट चुका है, मैं हूँ
Fauziya Rabab
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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ज़रा नज़दीक आ कर सुन मेरी इक बात ऐ उर्दू मेरी तहरीर बिन तेरे मुक़म्मल हो नहीं सकती
Avtar Singh Jasser
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तुझ से दूर हुआ तो ये मालूम हुआ ख़ुद से कितना दूर निकल आया था मैं
Avtar Singh Jasser
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शहर के रस्ते लगे जब सख़्त अपने पाँव को हम दिवाने लौट आए फिर से अपने गाँव को माँ के आँचल का सुकूँ भी याद आया तब हमें याद जब हम ने किया पीपल की ठंडी छाँव को
Avtar Singh Jasser
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मेरे हिस्से में आया इक ऐसा ग़म जिस के आगे लाखों ख़ुशियाँ भी हैं कम
Avtar Singh Jasser
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कहाँ तक साथ दोगी तुम हमारा सनम जावेदाँ है ये ग़म हमारा
Avtar Singh Jasser
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