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आलम ख़यालों का बड़ा अतरंगी है इक दिन बड़ा इक साल छोटा लगता है

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मुझे आज़ाद कर दो एक दिन सब सच बता कर तुम्हारे और उस के दरमियाँ क्या चल रहा है

Tehzeeb Hafi

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जाने क्या कुछ कर बैठा है बहुत दिनों से घर बैठा है वो मधुमास लिखे भी कैसे शाखों पर पतझर बैठा है

Vigyan Vrat

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गुमान है या किसी विश्वास में है सभी अच्छे दिनों की आस में है ये कैसा जश्न है घर वापसी का अभी तो राम ही वनवास में है

Azhar Iqbal

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ज़िंदगी कहते हैं जिस को चार दिन की बात है बस हमेशा रहने वाली इक ख़ुदा की ज़ात है

Unknown

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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो

Tehzeeb Hafi

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