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आता है काम कब ये सिखाया हुआ सबक़ सब सीख के भी हाथ पे छाले पड़े रहे

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उस के आगे कहें मजाल करें बोल सकते हैं जो मलाल करें आप शाइ'र हैं कह के वो मुझ सेे रोज़ कहता है इक सवाल करें

Subodh Sharma "Subh"

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देखता मैं रोज़ सर तन से जुदा होते हुए हाथ में तलवार पकड़े हैं ख़ुदा होते हुए

Subodh Sharma "Subh"

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सर्द का मौसम था वो अपने गाँव से चल कर आती थी उस के बालों पलकों पे गिर के शबनम इठलाती थी बुशरा लहजा गाल गुलाबी और बहुत कुछ था लेकिन सब सेे ज़्यादा मुझ को उस की भूरी आँखें भाती थी

Subodh Sharma "Subh"

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तू बता कैसे मैं ख़ुद को इस तरह से बाँट लूँ एक चुनना है मुझे फिर क्यूँ दहाई छाँट लूँ वो गले लग कर मुझे रोता है 'शुभ' हर बार तो पहले ग़ुस्सा कर चुका हूँ अब ज़रा सा डाँट लूँ

Subodh Sharma "Subh"

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मक़ाम-ए-दिल में दर्जा दो दफ़ा हासिल नहीं होता मेरी उँगली कमल पर है मगर ये दिल नहीं होता पढ़ाई छोड़ कर मैं लौट आया गाँव को अपने फ़क़त डिग्री से अब कुछ भी कहीं हासिल नहीं होता

Subodh Sharma "Subh"

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