सर्द का मौसम था वो अपने गाँव से चल कर आती थी उस के बालों पलकों पे गिर के शबनम इठलाती थी बुशरा लहजा गाल गुलाबी और बहुत कुछ था लेकिन सब सेे ज़्यादा मुझ को उस की भूरी आँखें भाती थी
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तुम्हें ये ग़म है कि अब चिट्ठियाँ नहीं आती हमारी सोचो हमें हिचकियाँ नहीं आती
Charagh Sharma
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ईद ख़ुशियों का दिन सही लेकिन इक उदासी भी साथ लाती है ज़ख़्म उभरते हैं जाने कब कब के जाने किस किस की याद आती है
Farhat Ehsaas
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इक कली की पलकों पर सर्द धूप ठहरी थी इश्क़ का महीना था हुस्न की दुपहरी थी ख़्वाब याद आते हैं और फिर डराते हैं जागना बताता है नींद कितनी गहरी थी
Vikram Gaur Vairagi
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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
Mirza Ghalib
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अपने दिल में बसाओगे हम को और गले से लगाओगे हम को हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल तुम तो पागल बनाओगे हम को
Abrar Kashif
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उस के आगे कहें मजाल करें बोल सकते हैं जो मलाल करें आप शाइ'र हैं कह के वो मुझ सेे रोज़ कहता है इक सवाल करें
Subodh Sharma "Subh"
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देखता मैं रोज़ सर तन से जुदा होते हुए हाथ में तलवार पकड़े हैं ख़ुदा होते हुए
Subodh Sharma "Subh"
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तुम हो ज़ोया इश्क़ मेरा इस बनारस की तरह पर मैं कुंदन तो नहीं हूँ जो कलाई काट लूँ
Subodh Sharma "Subh"
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चल दिया पलट के मैं घर ख़ुमार बाक़ी है कुछ सुधार है मुझ में कुछ सुधार बाक़ी है साथ जो मेरे था, मैं क़र्ज़-दार सबका हूँ शुक्र है ख़ुदा मुझ पे इक उधार बाक़ी है
Subodh Sharma "Subh"
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मक़ाम-ए-दिल में दर्जा दो दफ़ा हासिल नहीं होता मेरी उँगली कमल पर है मगर ये दिल नहीं होता पढ़ाई छोड़ कर मैं लौट आया गाँव को अपने फ़क़त डिग्री से अब कुछ भी कहीं हासिल नहीं होता
Subodh Sharma "Subh"
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