sherKuch Alfaaz

मक़ाम-ए-दिल में दर्जा दो दफ़ा हासिल नहीं होता मेरी उँगली कमल पर है मगर ये दिल नहीं होता पढ़ाई छोड़ कर मैं लौट आया गाँव को अपने फ़क़त डिग्री से अब कुछ भी कहीं हासिल नहीं होता

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देखता मैं रोज़ सर तन से जुदा होते हुए हाथ में तलवार पकड़े हैं ख़ुदा होते हुए

Subodh Sharma "Subh"

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सर्द का मौसम था वो अपने गाँव से चल कर आती थी उस के बालों पलकों पे गिर के शबनम इठलाती थी बुशरा लहजा गाल गुलाबी और बहुत कुछ था लेकिन सब सेे ज़्यादा मुझ को उस की भूरी आँखें भाती थी

Subodh Sharma "Subh"

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उस के आगे कहें मजाल करें बोल सकते हैं जो मलाल करें आप शाइ'र हैं कह के वो मुझ सेे रोज़ कहता है इक सवाल करें

Subodh Sharma "Subh"

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कुछ देर यहाँ बैठो वो चाँद झुलस जाए फिर ख़ुद ही कहे ख़ुद से ये दीद मुबारक हो जिस को भी मिलो हँस के ये एक हिदायत दो गुड़िया ये उसे कहना तुम ईद मुबारक हो

Subodh Sharma "Subh"

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किताबों में मेरा दिल है यहीं रखना लिखा हो नाम उस का बस वहीं रखना वहीं रखना जहाँ पे छाँव हो उस की वगरना क़ब्र सहरा में नहीं रखना

Subodh Sharma "Subh"

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