अगर सब कहेंगे यूँंँ हिज़रत पे गज़लें कहाँँ फिर मिलेगी मोहब्बत पे गज़लें मोहब्बत मोहब्बत मैं गाता रहूँँगा अगर तुम सुनाओगे नफ़रत पे गज़लें
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Mirza Ghalib
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ये हम ही हैं कि किसी के अगर हुए तो हुए तुम्हारा क्या है कोई होगा कोई था कोई है
Irfan Sattar
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ये जो हिजरत के मारे हुए हैं यहाँ अगले मिसरे पे रो के कहेंगे कि हाँ
Ali Zaryoun
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यही बहुत है मिरे ग़म में तुम शरीक हुए मैं हॅंस पड़ूँगा अगर तुम ने अब दिलासा दिया
Imran Aami
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे
Tehzeeb Hafi
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तेरी याद में हम ने ग़ज़लें कही थी तभी तो बड़ा ख़ूब ये साल गुज़रा
Harshwardhan Aurangabadi
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रफ़्ता-रफ़्ता सब कुछ खोने को बैठा हूँ क्यूँँ चाहत में पागल होने को बैठा हूँ ना आया था साथी मेरा, ना आएगा सजदे में, राहों पर रोने को बैठा हूँ
Harshwardhan Aurangabadi
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उस के हक में मुझे जो लगा कर दिया क़ैद से उस को हम ने रिहा कर दिया बात हिम्मत से दिल की कही थी मगर आपने जो सुना अन-सुना कर दिया
Harshwardhan Aurangabadi
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बचा गर सकोगे मुझे उस के ग़म से तभी ख़ुद-कुशी से मुझे तुम बचाना
Harshwardhan Aurangabadi
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वो अपनी ज़िंदगी में, हम सफ़र कुछ यूँँ बदलते हैं नया गर मिल गया कोई, पुराना छोड़ देते हैं
Harshwardhan Aurangabadi
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