अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब रोए
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आज तो दिल के दर्द पर हँस कर दर्द का दिल दुखा दिया मैं ने
Zubair Ali Tabish
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दर्द हो दिल में तो दवा कीजे दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे
Mirza Ghalib
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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
Mirza Ghalib
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तेरी आँखों में जो इक क़तरा छुपा है, मैं हूँ जिस ने छुप छुप के तेरा दर्द सहा है, मैं हूँ एक पत्थर कि जिसे आँच न आई, तू है एक आईना कि जो टूट चुका है, मैं हूँ
Fauziya Rabab
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ख़्वाबों को आँखों से मिन्हा करती है नींद हमेशा मुझ सेे धोखा करती है उस लड़की से बस अब इतना रिश्ता है मिल जाए तो बात वग़ैरा करती है
Tehzeeb Hafi
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रात रो रो के गुज़ारी है चराग़ों की तरह तब कहीं हर्फ़ में तासीर नज़र आई है
Tariq Naeem
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ज़मीन इतनी नहीं है कि पाँव रख पाएँ दिल-ए-ख़राब की ज़िद है कि घर बनाया जाए
Tariq Naeem
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पड़ने लगा था एक ख़लल सा उड़ान में रस्ते से आसमान हटना पड़ा मुझे
Tariq Naeem
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अब आसमान भी कम पड़ रहे हैं उस के लिए क़दम ज़मीन पे रक्खा था जिस ने डरते हुए
Tariq Naeem
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मैं जल्दबाज़ी में ख़ुद ही उठा के ले आया मेरे बदन पे अभी काम होने वाला था
Tariq Naeem
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