बैठ कर बात की और जुदा हो गए कोई शिकवा नहीं कोई झगड़ा नहीं
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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बड़े नादान हो तुम भी ज़रा समझा करो बातें गले मिल कर जो रोती है बिछड़ कर कितना रोएगी
Ankita Singh
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कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा किस को इतनी आसानी से हासिल था मैं
Shariq Kaifi
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कहाँ रोते उसे शादी के घर में सो इक सूनी सड़क पर आ गए हम
Shariq Kaifi
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ये काम दोनों तरफ़ हुआ है उसे भी आदत पड़ी है मेरी
Shariq Kaifi
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तेरी बातों में यूँँ भी आ गया मैं भटकने का बहुत दिल कर रहा था
Shariq Kaifi
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वहाँ ईद क्या वहाँ दीद क्या जहाँ चाँद रात न आई हो
Shariq Kaifi
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