चालीस साल इस को अकेले निभाएँगे ये चार साल का जो तअल्लुक़ था दरमियाँ
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साल के तीन सौ पैंसठ दिन में एक भी रात नहीं है उस की वो मुझे छोड़ दे और ख़ुश भी रहे इतनी औक़ात नहीं है उस की
Muzdum Khan
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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं
Jaun Elia
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फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी
Aziz Nabeel
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किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना
Bashir Badr
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हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
Javed Akhtar
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हर कोई सब्र की तलक़ीन किया करता है पर कोई ये तो बताए कि करूँँ मैं, कैसे?
Afzal Ali Afzal
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कुछ तो करें कि दिल ये कहीं और जा लगे कुछ देर के लिए सही आँखों को चैन हो
Afzal Ali Afzal
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दुआएँ दे रहे हैं उस को ज़िंदगी की मगर हमीं हैं जिस ने कि जीना मुहाल कर दिया है
Afzal Ali Afzal
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ऐसी हैं क़ुर्बतें के मुझी में बसा है वो ऐसे हैं फ़ासले के नहीं राब्ता नसीब
Afzal Ali Afzal
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काट पाऊँगा मैं कैसे ज़िंदगी तेरे बग़ैर तीन दिन का हिज्र मुझ को लग रहा है तीन साल
Afzal Ali Afzal
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