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चराग़ाँ ढूँढ़ते हैं आतिश-ए-दिल को बुझाने को मुहब्बत की समझ दे कौन इस जाहिल ज़माने को फ़रार-ए-क़ैद ले कर उड़ गया ख़ुशियाँ घराने की किया था क़ैद इक पंछी कि घर का दिल लगाने को

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शाम को दीदार अपना आइने में हो गया फ़ाश सब किरदार अपना आइने में हो गया बरगुज़ीदा एक सूरत क़ैद आँखों में हुई और बस घर-बार अपना आइने में हो गया

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझ में अक़्ल कुछ बाक़ी थी आके चर गया मुझ में फ़लसफ़ी अंदाज़ ये है आप की नेमत शा'इरी करता था जो कल मर गया मुझ में

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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ज़िक्र होता है तिरा जब भी धड़कता दिल बहुत है भूलना तुझ को सितमगर आज भी मुश्किल बहुत है

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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ख़ुदाया ज़िंदगी में काश ये वक़्फ़ा नहीं होता यहाँ पेशानियों का बोझ तक हल्का नहीं होता गुज़र जाते ये दिन हैं वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा में मगर ये रात का साया कभी धुँदला नहीं होता

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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जिस तरफ़ भी हाथ डाला ग़म निकल आए हो रफ़ू कैसे बदन की दम निकल आए खा रहा था अक्स तेरा जो रहा मुझ में थे नहीं महफूज़ ख़ुद में हम निकल आए

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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