दिन गुजारूंँ आप के बिन ये तो था मुश्किल बहुत ख़ुद ख़ुशी से मर गया मैं, ख़ुद-कुशी आसान थी
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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किस लिए देखती हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
Jaun Elia
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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने
Zia Mazkoor
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शिकायत के सिवा देखो उसे कुछ भी नहीं आता अगर हम एक-दो कर दें उसी पर रूठ जाता है
Shubham Seth
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किसी की ख़्वाहिशों को कब तलक तुम बाँध पाओगे बड़ा वो पेड़ होगा और गमला टूट जाएगा
Shubham Seth
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तुझे शीशा बनाया है ख़ुदा ने ध्यान रक्खा कर गले पत्थर के जो लगने लगेगा टूट जाएगा
Shubham Seth
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पानी में मैं डूब रहा हूँ देख मुझे दरिया से ख़ुद दूर किनारा जाएगा
Shubham Seth
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कभी राहें मैं भूलूँ तो कभी घर भूल जाता हूँ सिवा तेरे सभी चीजें मैं अक्सर भूल जाता हूँ अचानक नींद से उठकर कभी भी रोने लगता हूँ तुझे क्या सच में लगता है मैं सोकर भूल जाता हूँ
Shubham Seth
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