दिन रात सुब्ह शाम कई साल लग गए पाने में ये मुक़ाम कई साल लग गए
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है
Tehzeeb Hafi
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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मैं भी इक शख़्स पे इक शर्त लगा बैठा था तुम भी इक रोज़ इसी खेल में हारोगे मुझे ईद के दिन की तरह तुम ने मुझे ज़ाया' किया मैं समझता था मुहब्बत से गुज़ारोगे मुझे
Ali Zaryoun
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तुम इन्तिज़ार तो कर दोगे ख़त्म आ के मगर न कर सकोगे अदा मेरे इन्तिज़ार का हक़
Saif Dehlvi
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ता-उम्र तिरे पास ये बैठे न रहेंगे नादाँ तू बुज़ुर्गों को ज़रा वक़्त दिया कर
Saif Dehlvi
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हरगिज़ न अपने दिल में मेरा मलाल रखना देखो जहाँ भी रहना अपना ख़याल रखना
Saif Dehlvi
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वहाँ गंदुम ने कहीं का न रखा यहाँ पे तुम ने कहीं का न रखा
Saif Dehlvi
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वो राह-ए-मोहब्बत में भला ख़ाक चलेंगे जो सोचते हों फ़ाएदे नुक़्सान की बातें इक बे-वफ़ा से इतनी मोहब्बत है मुझे 'सैफ़' आती हैं ग़ज़ल में भी उस इंसान की बातें
Saif Dehlvi
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