ता-उम्र तिरे पास ये बैठे न रहेंगे नादाँ तू बुज़ुर्गों को ज़रा वक़्त दिया कर
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मत से तिरे सहमत न हो सरकार हिन्दुस्तान में मत दान कर फिर अपना मत ऐसे किसी मतदान में
nakul kumar
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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
Shahryar
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किसी कली किसी गुल में किसी चमन में नहीं वो रंग है ही नहीं जो तिरे बदन में नहीं
Farhat Ehsaas
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अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है
Qamar Moradabadi
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याराँ वो जो है मेरा मसीहा-ए-जान-ओ-दिल बे-हद अज़ीज़ है मुझे अच्छा किए बग़ैर मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर
Jaun Elia
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तुम इन्तिज़ार तो कर दोगे ख़त्म आ के मगर न कर सकोगे अदा मेरे इन्तिज़ार का हक़
Saif Dehlvi
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यक़ीन मान जो दिन तेरे साथ गुज़रे थे उन्हीं दिनों को मैं इस ज़िन्दगी में गिनता हूँ
Saif Dehlvi
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हम घर से तो चले थे किसी और काम को फिर यूँँ हुआ कि उन की गली याद आ गई
Saif Dehlvi
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दिन रात सुब्ह शाम कई साल लग गए पाने में ये मुक़ाम कई साल लग गए
Saif Dehlvi
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लाख समझाते रहे उस को ज़माने वाले आदमी कुछ न करे दिल पे असर होने तक सैफ़ इस बात से अंदाज़ा लगा लो सब कुछ पूछा जाता है शजर सिर्फ़ समर होने तक
Saif Dehlvi
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