दोस्त होकर भी है मेरा दुश्मन उस का किरदार दो-मुहाँ सा है
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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मुझ से मत पूछो के उस शख़्स में क्या अच्छा है अच्छे अच्छों से मुझे मेरा बुरा अच्छा है किस तरह मुझ से मुहब्बत में कोई जीत गया ये न कह देना के बिस्तर में बड़ा अच्छा है
Tehzeeb Hafi
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क्या ख़बर कौन था वो, और मेरा क्या लगता था जिस सेे मिल कर मुझे, हर शख़्स बुरा लगता था
Tehzeeb Hafi
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सारी दुनिया से किनारा भी नहीं कर सकते तेरी यादों पे गुज़ारा भी नहीं कर सकते रू-ब-रू आज हुए भी तो हुए ऐसी जगह हम कोई साफ़ इशारा भी नहीं कर सकते
Daagh Aligarhi
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मिटते मिटते मिटती है हो अगर कसक कोई ज़ख़्म चाहे जैसा हो, भरते भरते भरता है
Daagh Aligarhi
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इक शहनशाह ने बनवा के हँसी ताजमहल हाथ कटवाए ग़रीबों के, हुनर छीन लिया
Daagh Aligarhi
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ले हम भी सर उठाते हैं मुहब्बत दिखा जो दाँव आते हैं मुहब्बत अलिफ़ से मीम तक लाए थे जिन को वो हम को ही सिखाते हैं मुहब्बत
Daagh Aligarhi
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बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो उस सेे इश्क़ की आस न करना जिस का मन बंजारा हो ख़ुद को शाइ'र कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो
Daagh Aligarhi
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