ग़र ये तमाशा शहर में यूँँ ही लगा रहे कुछ देर देख कर कहूँ अब छोड़ देता हूँ
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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पूरी नहीं हो पाती है कोई ग़ज़ल मिरी मैं नाम तेरा लिखके क़लम तोड़ देता हूँ
Paras Angral
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मैं इसी सम्त ही तो बैठा हूँ तेरी जिस सम्त वापसी होगी
Paras Angral
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गर न मेरी आँखें होती क्या मुझे फिर पैसा दिखता
Paras Angral
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जब कोई देख न पाएगा मुझे दुनिया में तेरी आँखों में दिखूँगा कोई जब देखेगा
Paras Angral
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फ़ज़्ल या मौला ऐसा करो बंदे को फिर से बंदा करो
Paras Angral
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