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हर सम्त है ख़ुदा वो किसी से जुदा नहीं गालिब नज़र से पी है नज़र में ख़ुदा नहीं

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उस के आगे कहें मजाल करें बोल सकते हैं जो मलाल करें आप शाइ'र हैं कह के वो मुझ सेे रोज़ कहता है इक सवाल करें

Subodh Sharma "Subh"

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कुछ देर यहाँ बैठो वो चाँद झुलस जाए फिर ख़ुद ही कहे ख़ुद से ये दीद मुबारक हो जिस को भी मिलो हँस के ये एक हिदायत दो गुड़िया ये उसे कहना तुम ईद मुबारक हो

Subodh Sharma "Subh"

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देखता मैं रोज़ सर तन से जुदा होते हुए हाथ में तलवार पकड़े हैं ख़ुदा होते हुए

Subodh Sharma "Subh"

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तुम हो ज़ोया इश्क़ मेरा इस बनारस की तरह पर मैं कुंदन तो नहीं हूँ जो कलाई काट लूँ

Subodh Sharma "Subh"

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सर्द का मौसम था वो अपने गाँव से चल कर आती थी उस के बालों पलकों पे गिर के शबनम इठलाती थी बुशरा लहजा गाल गुलाबी और बहुत कुछ था लेकिन सब सेे ज़्यादा मुझ को उस की भूरी आँखें भाती थी

Subodh Sharma "Subh"

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