हिज्र-ए-रंगत में आ भटके हैं हम नहीं हैं वो जो लगते हैं
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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उस की ऑंखें जो बात करती हैं या'नी खारा है उस का लहजा फिर
Sameer Zaki
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मेरी मुहब्बत का हसीं ख़्वाब हो तुम अपनी निगाहों में बसाया है तुम्हें
Sameer Zaki
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मेरा वजूद क्या है तेरे बग़ैर गोया मामूली शे'र हूँ मैं तू है ग़ज़ल मुकम्मल
Sameer Zaki
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आदमी को यूँँ नहीं मतलब वफ़ा से जिस्म से जो आदमी का मतलब है
Sameer Zaki
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दिल तेरा अगर कोई टटोले मुझे पूछे कह देना मोहब्बत से मेरी बनती नहीं है
Sameer Zaki
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