मेरा वजूद क्या है तेरे बग़ैर गोया मामूली शे'र हूँ मैं तू है ग़ज़ल मुकम्मल
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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उस की ऑंखें जो बात करती हैं या'नी खारा है उस का लहजा फिर
Sameer Zaki
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मेरी मुहब्बत का हसीं ख़्वाब हो तुम अपनी निगाहों में बसाया है तुम्हें
Sameer Zaki
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दिल तेरा अगर कोई टटोले मुझे पूछे कह देना मोहब्बत से मेरी बनती नहीं है
Sameer Zaki
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हिज्र-ए-रंगत में आ भटके हैं हम नहीं हैं वो जो लगते हैं
Sameer Zaki
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आदमी को यूँँ नहीं मतलब वफ़ा से जिस्म से जो आदमी का मतलब है
Sameer Zaki
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