हम-नवाई इस जहाँ की यकसाँ तन्हाई ही तो है कोई कितना हो करीबी साथ परछाई ही तो है
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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सब इंतिज़ार में थे कब कोई ज़बान खुले फिर उस के होंठ खुले और सबके कान खुले
Umair Najmi
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अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
Bhaskar Shukla
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ग़लत था या सही था वो मगर अपना कभी था वो
Mohsin Ahmad Khan
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ये मिसरा तेरी मेरी उस मोहब्बत की वज़ाहत है तुझे मुझ से मोहब्बत थी मुझे तुझ से मोहब्बत है
Mohsin Ahmad Khan
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ये सारा जहाँ एक तस्बीह सा है वो जब चाहता है इसे फेरता है
Mohsin Ahmad Khan
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तुम को मर जाने की तमन्ना थी जाओ तुम को दी ज़िंदगी हम ने
Mohsin Ahmad Khan
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दिल के कूँचे को आबाद कर भूले से, पर मुझे याद कर
Mohsin Ahmad Khan
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