हमीं को क़ातिल कहेगी दुनिया हमारा ही क़त्ल-ए-आम होगा हमीं कुएँ खोदते फिरेंगे हमीं पे पानी हराम होगा अगर यही ज़ेहनियत रही तो मुझे ये डर है कि इस सदी में न कोई अब्दुल हमीद होगा न कोई अब्दुल कलाम होगा
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं वही दुनिया बदलते जा रहे हैं
Jigar Moradabadi
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हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
Mirza Ghalib
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कोई काँटा कोई पत्थर नहीं है तो फिर तू सीधे रस्ते पर नहीं है मैं इस दुनिया के अंदर रह रहा हूँ मगर दुनिया मेरे अंदर नहीं है
Zubair Ali Tabish
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बहुत सताते हैं वो रिश्ते जो टूट जाते हैं ख़ुदा किसी को भी तौफ़ीक़-ए-आशनाई न दे
Meraj Faizabadi
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सुना है बंद कर लीं उस ने आँखें कई रातों से वो सोया नहीं था
Meraj Faizabadi
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मैं सारी उम्र अँधेरों में काट सकता हूँ मेरे दियों को मगर रौशनी पराई न दे
Meraj Faizabadi
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ज़िंदगी भर तो कोई झूठ जिया है मैं ने तू जो आ जाए तो ये आख़िरी पल सच हो जाए
Meraj Faizabadi
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जब तुझे रिश्ते निभाने का हुनर आ जाएगा तेरा दुश्मन ख़ुद ही चल कर तेरे घर आ जाएगा
Meraj Faizabadi
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