हुस्न का ज़ोम है आप को बे-हिसाब नज़रें ये आप से हट न जाएँ कहीं
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बात ऐसी भी भला आप में क्या रक्खी है इक दिवाने ने ज़मीं सर पे उठा रक्खी है इत्तिफ़ाक़न कहीं मिल जाए तो कहना उस सेे तेरे शाइ'र ने बड़ी धूम मचा रक्खी है
Ismail Raaz
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं
Rehman Faris
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वो बुज़ुर्गों की बताई तो कहीं मिलती नहीं अब दुखों को झेलती ही बस जवानी रह गई
Parul Singh "Noor"
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जगह की क़ैद नहीं थी कोई कहीं बैठे जहाँ मक़ाम हमारा था हम वहीं बैठे अमीर-ए-शहर के आने पे उठना पड़ता है लिहाज़ा अगली सफ़ों में कभी नहीं बैठे
Mehshar Afridi
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दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
Bashir Badr
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टूटा जब तारा तो आँखें हर एक ने मूँद लीं कोई तो देखता आसमाँ को भी रोते हुए
Prakash Pandey
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दे कर लब पे निशान वो पूछा बता कि और क्या है ख़्वाइश तेरी
Prakash Pandey
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तय हुआ था बात होगी वस्ल पे बस आँखों से जाने कब होंठों ने होंठों को इशारा कर दिया
Prakash Pandey
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उन सेे करने गए इश्क़ के मसअलों के हिसाब हँस के कहने लगे आप को नींद तो आती है
Prakash Pandey
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आलम में करते हो नुमाइश इस क़दर रंज-ओ-अलम की ये लब नहीं खुलते जो ग़म ना-क़ाबिल-ए-बरदाश्त होता
Prakash Pandey
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