इन की आदत फ़रेब ओ मक्कारी ज़िक्र ही क्यूँ करें हसीनों का
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती
Mirza Ghalib
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ज़िक्र हर-सू बिखर गया उस का कोई दीवाना मर गया उस का उस ने जी भर के मुझ को चाहा था और फिर जी ही भर गया उस का
Zubair Ali Tabish
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जुदा हुए हैं बहुत लोग एक तुम भी सही अब इतनी बात पे क्या ज़िंदगी हराम करें
Nasir Kazmi
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क्यूँ लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग़्में बहुत प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
nakul kumar
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जिस को रहती है हर घड़ी तेरी फ़िक्र ऐसे आशिक़ से दिल-लगी करना
''Akbar Rizvi"
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नुसरत-ए-हक़ देखना आशूर तक ले जाएगी हसरत-ए-दीदार कोह-ए-तूर तक ले जाएगी
''Akbar Rizvi"
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बा'द में बिखरे अगर और भी होगा अफ़सोस मैं न बच्चों को नए ख़्वाब सजाने दूँगा
''Akbar Rizvi"
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वक़्त किस तरह देखो करवटें बदलता है कल जो मेरे हामी थे आज मेरे दुश्मन हैं
''Akbar Rizvi"
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वक़्त ए मुश्किल तुम्हें ख़ालिक़ ही सहारा देगा अपने अहबाब से उम्मीद ए वफ़ा मत रखना
''Akbar Rizvi"
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