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इश्क़ का बस यही तो मज़ा है हिज्र के बा'द मिलती क़ज़ा है मौत से ख़ौफ थोड़ी है, आए अब तो बे-इश्क़ ये ही रज़ा है

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ये नई चादर जो लाई जा रही है तेरे बिस्तर पे बिछाई जा रही है ख़ुश है ना तू ग़ैर रिश्ते में तभी बससज ये तेरी सजाई जा रही है

Deep kamal panecha

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क़लह ख़ामोश करने घर की मन के काले जाएँगे मुझे डस लेंगे लेकिन फिर भी बिच्छू पाले जाएँगे मिरे दुश्मन जो आ तो मैं गया ना अपनी करने पे जनाज़े को भी तेरे शानों के पड़ लाले जाएँगे

Deep kamal panecha

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वो पड़े इस बात पे हम सेे उलझ के आज दिन में आपने कैसे तो कैसे सुब्ह दूजा चाँद देखा

Deep kamal panecha

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मैं ने माँगा फ़क़त अपने हक़ का ही है 'दीप' तो तेरे दर पे सवाली नहीं

Deep kamal panecha

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ये दिल है तेरा या मेरा ख़याल कुछ भी नहीं ये शाम है या सवेरा ख़याल कुछ भी नहीं याँ इक मैं हूँ जिस को तेरा ही है ख़याल फ़क़त वाँ इक तू है जिस को मेरा ख़याल कुछ भी नहीं

Deep kamal panecha

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