इसी फ़कीर की गफ़लत से आगही ली है मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है गली-गली में भटकता है शोर करता हुआ हमारे इश्क़ ने सस्ती शराब पी ली है
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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तुम बहुत ख़ुश रहोगी मेरे साथ वैसे हर इक की अपनी मर्ज़ी है
Tehzeeb Hafi
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी
Ammar Iqbal
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नज़र से तुम को मिले न कोई सुराग़ दिल का झुका के गर्दन बुझा लिया है चराग़ दिल का सुनूँ न कैसे करूँँ न क्यूँँकर मैं अपने दिल की मेरे अलावा है कौन इस बद-दिमाग़ दिल का
Ammar Iqbal
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ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं
Ammar Iqbal
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मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है
Ammar Iqbal
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रंग-ओ-रस की हवस और बस मसअला दस्तरस और बस यूँँ बुनी हैं रगें जिस्म की एक नस टस से मस और बस
Ammar Iqbal
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