जाने यहाँ मिलते हैं कैसे कैसे लोग कुछ अलहदा कुछ हम सेे मिलते जुलते लोग
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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ये शहर-ए-अजनबी में अब किसे जा कर बताएँ हम कहाँ के रहने वाले हैं कहाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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ख़ुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना ये सारे खेल हैं, इन में उदास मत होना
Kumar Vishwas
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ये उलझनें मुझे ही खा रही हैं अब ख़ुद को ही सताए फिर रहे हैं
Hrishita Singh
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मैं तो कमज़र्फ़ हूँ और तू है ज़की लोगों ने मेरा सच फिर तो बातिल किया
Hrishita Singh
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उस का ग़म मुझ पर तारी है अब तक हस्ती ये जारी है आमद हो जानी है उस की जिस के आने तैयारी है
Hrishita Singh
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तुम न आए तो सावन भी पतझड़ लगे मेरी मेहंदी के हर रंग फीके पड़े
Hrishita Singh
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याँ दानाई के सब दरवाज़े भी खुलते हैं याँ सब को इक जैसा ही नश्शा भी होता है
Hrishita Singh
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