जिन शाह को फ़क़त हो तलब तख़्त-ओ-ताज की उन के लिए तो तख़्त के मानी है राबिया
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए आइना देखा गया, बाल सँवारे गए
Jaun Elia
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इसीलिए तो सब सेे ज़्यादा भाती हो कितने सच्चे दिल से झूठी क़स में खाती हो
Tehzeeb Hafi
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इसीलिए तो मैं रोया नहीं बिछड़ते समय तुझे रवाना किया है जुदा नहीं किया है
Ali Zaryoun
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किस लिए देखती हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
Jaun Elia
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तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम
Faiz Ahmad
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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
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तुम जो आती हो जब भी पास मिरे क्यूँँ उतर जाते हैं लिबास मिरे
Faiz Ahmad
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जाने कब से बरस रहा हूँ मैं इक नज़र को तरस रहा हूँ मैं ज़िन्दगी सहरा हो गई है मिरी मौत को जो तरस रहा हूँ मैं
Faiz Ahmad
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किसी के रंज से उस को निकाल कर पहले उसी के रंज में अब ख़ुद ही फस गया हूँ मैं बड़ा कमीन हूँ दलदल में पैर ख़ुद रख कर ये कह रहा हूँ कि धोखे से धस गया हूँ मैं
Faiz Ahmad
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