तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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बड़े नादान हो तुम भी ज़रा समझा करो बातें गले मिल कर जो रोती है बिछड़ कर कितना रोएगी
Ankita Singh
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
Sahir Ludhianvi
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तुम जो आती हो जब भी पास मिरे क्यूँँ उतर जाते हैं लिबास मिरे
Faiz Ahmad
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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
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किसी के रंज से उस को निकाल कर पहले उसी के रंज में अब ख़ुद ही फस गया हूँ मैं बड़ा कमीन हूँ दलदल में पैर ख़ुद रख कर ये कह रहा हूँ कि धोखे से धस गया हूँ मैं
Faiz Ahmad
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जो दोस्तों से भी छुपाया मैं ने तुम वो राज़ थी हमें तो बे-वफा़ई भी सिखाई, तेरे इश्क़ ने तुम्हें ख़याल में भी जब छुआ तो बा-वुजू़ छुआ शराबी को सिखाई पारसाई, तेरे इश्क़ ने
Faiz Ahmad
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कोई कासिद नहीं है मेरे क़रीब तेरे ख़त मेरे तक नहीं आते
Faiz Ahmad
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