jis zakhm ki ho sakti ho tadbir rafu ki likh dijiyo ya rab use qismat mein adu ki ghalib offers a paradoxical prayer where he asks god to give his enemy wounds that can be cured. this implies that the poet reserves the fatal, unhealable wounds of love for himself, considering them a badge of honor that the rival is unworthy of bearing.
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बात ही कब किसी की मानी है अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी ये कलाई ये जिस्म और ये कमर तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी
Jaun Elia
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मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना
Rahat Indori
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हुस्न बला का क़ातिल हो पर आख़िर को बेचारा है इश्क़ तो वो क़ातिल जिस ने अपनों को भी मारा है ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी इस के छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी
Jaun Elia
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जनाज़े पर मेरे लिख देना यारों मोहब्बत करने वाला जा रहा है
Rahat Indori
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मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त
Ali Zaryoun
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बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर 'असद' जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा
Mirza Ghalib
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कोई वीरानी सी वीरानी है दश्त को देख के घर याद आया
Mirza Ghalib
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सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
Mirza Ghalib
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की मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
Mirza Ghalib
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ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होने तक
Mirza Ghalib
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