कई दिनों से अँधेरों का बोलबाला है चराग़ ले के पुकारो कहाँ उजाला है
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मैं चूमता हूँ तो वो हाथ खींच लेता है उसे पता है ये सीढ़ी कहाँ पे जानी है
Nadir Ariz
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मत पूछो कितना ग़मगीं हूँ गंगा जी और जमुना जी ज़्यादा तुम को याद नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था अब वो कहाँ है मैं तो वहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
Jaun Elia
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अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं
Jawwad Sheikh
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कहाँ तो ख़ाक उड़ाता था मुस्कुराता था मुझ ऐसे शख़्स को भी क्या से क्या बनाया गया
Vivek Bijnori
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रात दिन तेरे साथ कटते थे यार अब तुझ सेे बात से भी गए ये मोहब्बत भी किन दिनों में हुई दिल मिलाने थे हाथ से भी गए
Kafeel Rana
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गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा
Rahat Indori
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ऐ वतन इक रोज़ तेरी ख़ाक में खो जाएँगे सो जाएँगे मर के भी रिश्ता नहीं छूटेगा हिंदुस्तान से ईमान से
Rahat Indori
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घर के बाहर ढूँढ़ता रहता हूँ दुनिया घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है
Rahat Indori
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सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए
Rahat Indori
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मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
Rahat Indori
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