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किस क़दर सह में हुए हैं टूटने के डर से ये आप इन कच्चे घड़ों पर हाथ रख कर देखिए

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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं

nakul kumar

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हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है मैं कहता हूँ कि समझो तो कोई बात नहीं ऐसी लेकिन इस दुनिया में शोहरत की हवस मुझे अंदर से खा जाती है

nakul kumar

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पीपल बरगद नीम यहाँ पर छाँव ढूॅंढ़ने आते हैं बूढ़े होते नगर यहाँ पर गाँव ढूॅंढ़ने आते हैं चलते-चलते थकने वाले लोग यहाँ पर आख़िर में मेरे इन क़दमों में अपने पाँव ढूॅंढ़ने आते हैं

nakul kumar

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तेरे जाने के बा'द ये मुझे महसूस हुआ है तेरे आने के बा'द भी बहारें आ नहीं सकतीं

nakul kumar

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तन्हा रहता हूँ अक्सर ही हर एक का फिर हो जाता हूँ हो जाता हूँ जैसे दुनिया फिर ख़ुद में ही खो जाता हूँ चुप-चाप पड़ा हूँ कोने में ग़म दर्द जुदाई साथ लिए जब नींद कभी आ जाए तो ख़्वाबों को बिछा सो जाता हूँ

nakul kumar

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