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किसी की मंज़िलों का अक्स बनके भी तो देख किसी को रास्ता होकर गुज़र भी जाने दे

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तस्वीर इक जला के बुझाता रहा हूँ मैं उस के ही पास लौट के जाता रहा हूँ मैं ये ना-तमाम ख़्वाब हक़ीक़त हों किस तरह हर पल तो अपनी नींद उड़ाता रहा हूँ मैं

Hasan Raqim

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सोज़-ए-वफ़ा के नाम से अरमान थे बहुत लेकिन दयार -ए-इश्क़ से अंजान थे बहुत लगता था उन्हें इश्क़ की राहें हैं मुनाकिद आ कर के राह-ए-इश्क़ में हैरान थे बहुत

Hasan Raqim

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मेरी आँखों में बनकर ख़्वाब मुझ को आज़माती हैं तेरी यादें अभी तक रातों की नींदें उड़ाती हैं वो जिन अलमारियों में मैं तुम्हारी यादें रखता था उन्हीं अलमारियों में अब किताबें धूल खाती हैं

Hasan Raqim

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अपनी आदत है अगर होना तो बस एक दिल का कहने वाले इसी आदत को वफ़ा कहते हैं

Hasan Raqim

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ब-मंज़िल पर हूँ मगर ये मकाँ मंज़िल नहीं लगता सफ़र को भी मिरा अब कोई मुस्तक़बिल नहीं लगता

Hasan Raqim

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