कुछ यूँँ है तेरे जिस्म पर रंगीन तिल बेरी लगे हैं फूल जैसी झाड़ पर
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रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने
Zia Mazkoor
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हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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तुम हमें जिन दिनों रुला गई हो हम नहीं कुछ अधिक ही हँस रहे हैं
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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मिल-मिला के एक लड़की से वो गंगा घाट की सोएँगे फिर चैन से हम नर्मदा की गोद में
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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कितने शरीर टूटे हैं एक बदन बनाने में
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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ले गया कोई उस का बदन और हम रूह का एक नारा लगाते रहे
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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ख़ुदा से है गिला इस बात की है दुश्मनी ज़मीं पे बिन इजाज़त के उतारा है मुझे
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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