क्या कहूँ कुछ कहा भी नहीं जाता है बिन तिरे अब रहा भी नहीं जाता है ज़ख़्म ऐसा के मरहम कोई भी नहीं मुझ से ये सब सहा भी नहीं जाता है
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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याद में तेरी नहीं जो कभी सोया है मैं हूँ अपने ख़्वाबों में तुझे जिस ने पिरोया है मैं हूँ
Parvez Shaikh
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नौकरी भी चली ही गई है यूँ तो ज़िंदगी दर बदर की गई है यूँ तो कोई दुख को मिरे क्यूँ समझता नहीं तंज़ की बस सदा दी गई है यूँ तो
Parvez Shaikh
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ज़ुल्म करते हैं हम पे लोग अभी इतना क्यूँ जलते हम से लोग अभी हम ने तो हक़ किसी का खाया नहीं तंज़ कैसे भी देते लोग अभी
Parvez Shaikh
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ख़ुशी पर हमारा भी हक़ था मगर यूँँ ग़मों ने नहीं दी इजाज़त कभी भी
Parvez Shaikh
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ज़ुल्म ऐसा न मेरे साथ करें ज़िस्म में रूह भी न बाक़ी रहे
Parvez Shaikh
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