मैं अपने आप को भी हम नहीं बुलाता अब मिरा मुझ ही में होना भी मुझे गवारा नहीं
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुम जीने का इक फ़क़त सबब थी तुम था मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिर दिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम
Faiz Ahmad
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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
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तुम्हारे ग़म को मगर ओढ़े रक्खा तीनों दिन मैं चाहता तो मना सकता था तेरे बिन ईद
Faiz Ahmad
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सोचता हूँ के सब फ़ना कर दूँ खेंच के अपना दिल जुदा कर दूँ अब मोहब्बत से नज़रें फेर लीं हैं तू मिले भी तो अब मना कर दूँ
Faiz Ahmad
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तुम जो आती हो जब भी पास मिरे क्यूँँ उतर जाते हैं लिबास मिरे
Faiz Ahmad
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