मैं ख़ुद भी यार तुझे भूलने के हक़ में हूँ मगर जो बीच में कम-बख़्त शा'इरी है ना
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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बात करो रूठे यारों से सन्नाटों से डर जाते हैं प्यार अकेला जी लेता है दोस्त अकेले मर जाते हैं
Kumar Vishwas
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
Nida Fazli
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दानिस्ता मुझ आवारा से टकरा के ये दुनिया कहती है कि अंधे हो दिखाई नहीं देता
Afzal Khan
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तेरे जाने से ज़्यादा हैं न कम पहले थे हम को लाहक़ हैं वही अब भी जो ग़म पहले थे
Afzal Khan
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बना रक्खी हैं दीवारों पे तस्वीरें परिंदों की वगर्ना हम तो अपने घर की वीरानी से मर जाएँ
Afzal Khan
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इसी लिए हमें एहसास-ए-जुर्म है शायद अभी हमारी मोहब्बत नई नई है ना
Afzal Khan
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ये कह दिया है मिरे आँसुओं ने तंग आ कर हमें ब-वक़्त-ए-ज़रूरत निकालिए साहब
Afzal Khan
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