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मैं शाम से सोच में डूबा रहा क्यूँ प्यार मेरा बस अधूरा रहा

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ज़मीं पे आसमाँ पिघला हुआ ही पाओगे समय यूँँ हाथों से निकला हुआ ही पाओगे किसी के वास्ते ख़ुद को सँवार कर देखो तुम अपने आप को बदला हुआ ही पाओगे

Naviii dar b dar

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ज़माने में है ये जो तनक़ीद अपनी भला कोई किस रास्ते को चुने यूँँ

Naviii dar b dar

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ज़माने भर से तो की दिल-लगी हम ने मोहब्बत का सलीक़ा भी नहीं आया

Naviii dar b dar

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यूँँ तो ज़माने में अच्छी भी तर्बियत रखते हैं कुछ रौशन हो के भी अंधेरे की अहमियत रखते हैं कुछ हैं जानते क़द्र इंसा की दिल से होती यहाँ पर बस इस लिए अब भी दिल में इंसानियत रखते हैं कुछ

Naviii dar b dar

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यूँँ तो ज़माने में अच्छी भी-तर्बियत रखते हैं कुछ रौशन हो के जो अंधेरे की अहमियत रखते हैं कुछ वो जानते क़द्र इंसा की-दिल से होती यहाँ पर बस इस लिए अब भी दिल में-इंसानियत रखते हैं कुछ

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