मैं ने ख़ुद को बहलाने की इक तरकीब लगाई है जो भी मुझ को न मिल पाया, उस को तक़दीर बताई है
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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कभी आएगा और सब कुछ मिटा देगा ये मुझ को भी जो छुप के बैठा है अंदर मेरे, बाहर नहीं आया
BR SUDHAKAR
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नाच रहे सब सेे ये कह के फूल वो इन के पाज़ेब बनाती है
BR SUDHAKAR
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ये रोब तू अब दोस्तों पे क्यूँ दिखाता है वो तुझ पे जब चिल्ला रही थी तब कहाँ था ये
BR SUDHAKAR
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शा'इरी और नौकरी है दोनों ही मेरी ज़रूरत इक है दिल भरने को और इक पेट भरने के लिए है
BR SUDHAKAR
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उस के बिन मर जाएँगे हम ने कहा था अब हो कोशिश क्यूँ? कि जब जीना ग़लत है
BR SUDHAKAR
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