sherKuch Alfaaz

मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा उस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे

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मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त

Ali Zaryoun

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कबूतर को पता है घर तुम्हारा मिलेगा छत पे तुम को ख़त हमारा

Aqib Jawed

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निगाह-ए-शोख़ का क़ैदी नहीं है कौन यहाँ किसे तमन्ना नहीं फूल चूमने को मिले

Aks samastipuri

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मैं न कहता था हिज्र कुछ भी नहीं ख़ुद को हलकान कर रही थी तुम कितने आराम से हैं हम दोनों देखा बेकार डर रही थी तुम

Mehshar Afridi

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उस ने देखा मुझ को तो कुण्डी लगानी छोड़ दी फिर मिरे होंठों पे इक आधी कहानी छोड़ दी मैं छुपाए फिर रहा था इश्क़ अपने गाँव में और फिर ज़ालिम ने गर्दन पे निशानी छोड़ दी

nakul kumar

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