मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा उस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे
Related Sher
मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त
Ali Zaryoun
157 likes
कबूतर को पता है घर तुम्हारा मिलेगा छत पे तुम को ख़त हमारा
Aqib Jawed
67 likes
निगाह-ए-शोख़ का क़ैदी नहीं है कौन यहाँ किसे तमन्ना नहीं फूल चूमने को मिले
Aks samastipuri
51 likes
मैं न कहता था हिज्र कुछ भी नहीं ख़ुद को हलकान कर रही थी तुम कितने आराम से हैं हम दोनों देखा बेकार डर रही थी तुम
Mehshar Afridi
62 likes
उस ने देखा मुझ को तो कुण्डी लगानी छोड़ दी फिर मिरे होंठों पे इक आधी कहानी छोड़ दी मैं छुपाए फिर रहा था इश्क़ अपने गाँव में और फिर ज़ालिम ने गर्दन पे निशानी छोड़ दी
nakul kumar
67 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Meer Tahir Ali Rizvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Meer Tahir Ali Rizvi's sher.







