मौत को जब क़रीब से देखे सारे मंज़र अजीब से देखे
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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है
Tehzeeb Hafi
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मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती
Mirza Ghalib
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नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घू में लेकिन अब घर अच्छा लगता है
Nida Fazli
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
Allama Iqbal
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आप क्यूँँ रोएँगे मेरी ख़ातिर फ़र्ज़ ये सारे इस ग़ुलाम के हैं दिन में सौ बार याद करता हूँ पासवर्ड सारे तेरे नाम के हैं
Aadil Rasheed
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यार उस ने अब निशाना तय किया जाँ मगर पहले दिवाना तय किया वो सफ़र से लौट कर जो आ गया यार पहले ही ठिकाना तय किया
Arohi Tripathi
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राम लिखने लगी मैं काग़ज़ पर काम आसान हो गए मेरे
Arohi Tripathi
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अपने किए पे तुम हो पशेमान किस लिए इनकार कर रही हो मेरी जान किस लिए
Arohi Tripathi
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वो अगर फिर क़रीब आ जाए बन गई हूँ नसीब आ जाए
Arohi Tripathi
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दाग़ दामन पर तुम्हारे जब लगे ये न तुम भी देख पाए कब लगे ठीक उस ने तब निशाना तय किया तीर सीने में तुम्हारे जब लगे
Arohi Tripathi
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