परिंद शाख़ पे तन्हा उदास बैठा है उड़ान भूल गया मुद्दतों की बंदिश में
sherKuch Alfaaz
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हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे हम को भी हालात ने बाहर भेजा है
Zahid Bashir
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से वो और थे जो हार गए आसमान से
Faheem Jogapuri
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निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है
Umair Najmi
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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